जनाब ! बात आम की है | Rekhta Learning

जनाब ! बात आम की है

Mehr-e-Alam Khan|17 Jun, 2026
जनाब ! बात आम की है

जून और जुलाई का महीना आते ही पूरे हिन्दुस्तान में एक ख़ास सी ख़ुश्बू फैल जाती है। बाज़ारों में सुनहरी, ज़र्द, सब्ज़ और सुर्ख़ी माइल आमों के ढेर नज़र आने लगते हैं। कहीं दसहरी अपनी लताफ़त से दिल मोह रही होती है, कहीं चौंसा रस से लबरेज़ दिखाई देता है, कहीं लंगड़े की ख़ुश्बू लोगों को अपनी तरफ़ खींच रही होती है और कहीं अल्फ़ांसो अपनी मिठास और नफ़ासत का जादू जगा रहा होता है। यही वह दिन होते हैं जब आम सिर्फ़ एक फल नहीं रहता बल्कि एक तहवार, एक ज़ाइक़ा और एक याद बन जाता है।

इसी लिए हिन्दुस्तान में जून और जुलाई को आम के मौसम की इंतिहा का ज़माना समझा जाता है। दिल्ली, उत्तर प्रदेश, बिहार, गुजरात और मुल्क की कई दूसरी रियासतों में आम के मेले मुनअक़िद होते हैं। इन मेलों में सैंकड़ों अक़्साम के आम नुमाइश के लिए रखे जाते हैं। लोग मुख़्तलिफ़ आमों का ज़ाइक़ा चखते हैं, उनकी ख़ुश्बू से लुत्फ़-अंदोज़ होते हैं और इस फल की रंगा-रंग दुनिया से वाक़िफ़ होते हैं। ये मेले दरअस्ल आम की स़क़ाफ़त, तिजारत और इस से जुड़ी हुई अवामी मुहब्बत का जश्न होते हैं।

फलों का बादशाह कहलाने वाला आम हिन्दुस्तान की हैरत-अंगेज़ तहज़ीबी विरासत और ख़ुश-ज़ाइक़ा तनव्वो का जीता-जागता इस्तिआरा है। यह लज़ीज़ फल हिन्दुस्तान की शानदार तारीख़ का एक अहम हिस्सा है, जो सदियों से अह्ले-हिन्द के ज़ौक़ और  दिल पर हुकूमत करता आ रहा है।

आम तीन ममालिक , हिन्दुस्तान, पाकिस्तान और फ़िलिपीन्स  का क़ौमी फल है। बंगलादेश में आम का दरख़्त क़ौमी दरख़्त क़रार पाया है। भारत के अलावा चीन, थाई लैंड, मेक्सिको, पाकिस्तान, फ़िलिपीन्स, बंगलादेश, इंडोनेशिया, ब्राज़ील, नाइजीरिया, मिस्र, ऑस्ट्रेलिया, स्पेन वग़ैरा ममालिक में भी आम पैदा होता है।

हिन्दुस्तान की मज़हबी रिवायात में भी आम को ख़ास मक़ाम हासिल है। वेदों, उपनिषदों और पुराणों जैसे क़दीम सहीफ़ों में आम का ज़िक्र मौजूद है। वैदिक अदब में आम को “सहकरा” या “सहकारा” कहा गया है। उपनिषदों और पुराणों में आम के दरख़्त को काटने से सख़्ती से मना किया गया है। रामायण और महाभारत जैसे महाकाव्यों में आम को “कल्प वृक्ष” (ख़्वाहिशात पूरी करने वाला दरख़्त) कहा गया है।

हिन्दू रिवायात में आम का दरख़्त मुक़द्दस माना जाता है। आम के पत्तों से बनाई गई “तोरण” इबादतगाहों और घरों के दरवाज़ों पर सजाई जाती है और यह पाकीज़गी व तक़द्दुस की अलामत समझी जाती है। शादी-ब्याह, दीवाली और दीगर मज़हबी तक़ारीब में आम के पत्तों की सजावट आम मंज़र है। यहाँ तक कि “होम”, अग्नि होम में भी आम की लकड़ी इस्तेमाल की जाती है।

बौद्ध मत के अदब में भी आम के दरख़्त और फल को तक़द्दुस हासिल है। बौद्ध रिवायत में आम को इल्म और फ़ैयाज़ी का मंबा माना गया है। एक मशहूर रिवायत के मुताबिक़ राज नर्तकी अम्रपाली, जो बुद्ध की भक्त थी, ने बुद्ध को एक आम का बाग़ बतौर नज़राना पेश किया जहाँ वह मुराक़बा किया करते थे।
जैन धर्म में आम के दरख़्त को अहिंसा, कुदरती ख़ुशहाली और ज़रख़ेज़ी की अलामत समझा जाता है। जैनी रवायात में देवी अम्बिका, जो लक्ष्मी की सूरत मानी जाती हैं, को आम के गुच्छों के साथ दिखाया जाता है।

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हिन्दुस्तान के क़दीम तिब्बी निज़ाम आयुर्वेद में भी आम को ख़ास अहमियत हासिल है। आम के पत्ते, छाल और फल को दवा के तौर पर इस्तेमाल किया जाता है। ‘चरक संहिता’ जैसे आयुर्वेदिक मुतून में आम को हाज़िम, ताक़त-बख़्श और शहवत-अंगेज़ तस्लीम किया गया है।

जहाँ तक लफ़्ज़ “आम” की इब्तिदा का तअल्लुक़ है, हिन्दी और उर्दू का “आम” संस्कृत के “आम्र” से निकला है। दुनिया की कई ज़बानों में आम के लिए इस्तेमाल होने वाले अल्फ़ाज़ भारतीय ज़बानों से माख़ूज़ हैं, मसलन:

अंग्रेज़ी: मैंगो (Mango)
फ़्रांसीसी: मांग (Mangue)
अरबी: मन्जा (Manja)
फ़ारसी: अंबह (Anba)

ये सब जुनूबी भारतीय ज़बानों जैसे तमिल के मांगाय (Mangay), मलयालम के मांगा (Maanga), कन्नड़ के मानु (Maanu), और मराठी के आम्बा (Aamba) से निकले हैं। कुछ माहिरीन मानते हैं कि आम का साइंटिफ़िक नाम मैंगिफ़ेरा (Mangifera) भी संस्कृत के लफ़्ज़ “मंजरी” (आम की कली या नर्म पत्तियाँ) से आया है।

हिन्दुस्तान में आम की काश्त का तारीख़ी पस-मंज़र भी बहुत गहरा है। मौर्य बादशाह अशोक-ए-आज़म ने मुसाफ़िरों और जानवरों को साया और फल देने के लिए सड़कों के किनारे आम के दरख़्त लगवाए। मुग़ल बादशाहों  ख़ुसूसन अकबर, जहाँगीर और शाहजहाँ ने आम की काश्त को मुल्क भर में फैलाने में नुमायाँ किरदार अदा किया।

अकबर ने दरभंगा (बिहार) के क़रीब एक बहुत बड़ा बाग़ “लख बाग़” लगवाया, जिसमें एक लाख से ज़ाइद आम के दरख़्त थे। जहाँगीर ने अपनी सवानिह में भारतीय आम के ज़ाइक़े और ख़ुश्बू की बड़ी तारीफ़ की है। शाहजहाँ के दरबारी शाइरों ने आम को हिस्सी लज़्ज़त और ख़ुदाई नेमत का इस्तिआरा क़रार दिया है।
जहाँगीर के अहद (1618 ईस्वी) में उत्तर प्रदेश के ज़िला शामली के मक़ाम “कैराना” में पहली बार क़लमी आमों का बाग़ लगाया गया, जिसे जहाँगीर के बचपन के दोस्त सूबेदार मुक़र्रब ख़ाँ ने क़ायम किया। आख़िरी मुग़ल बादशाह बहादुर शाह ज़फ़र ने लाल क़िला दिल्ली में शाही ख़ानदान के लिए “हयात बाग़” के नाम से आम का बाग़ लगवाया।

सिफ़ारती सतह पर भी आम को दोस्ती के निशान के तौर पर इस्तेमाल किया गया। हुक्मरान एक दूसरे को नायाब अक़्साम के आम बतौर तहफ़्फ़ुज़ और तोहफ़ा भेजते थे। जदीद दौर में इसे “आम डिप्लोमेसी” (Mango Diplomacy) कहा गया है। हिन्दुस्तानी वुज़राए-आज़म ने मशरिक़े-वुस्ता और मग़रिबी ममालिक के सरबराहों को अल्फ़ांसो आमों के डिब्बे भिजवाए, यह ख़ैरसगाली और स़क़ाफ़ती ताल्लुक़ात की अलामत है।

हिन्दुस्तान दुनिया में आम पैदा करने वाला सबसे बड़ा मुल्क है। आलमी आम पैदावार का तक़रीबन 50 फ़ीसद भारत से आता है। नेशनल हार्टीकल्चर बोर्ड के मुताबिक़ भारत में 1500 से ज़ाइद तस्दीक़-शुदा अक़्साम के आम पाए जाते हैं, जिनमें एक हज़ार से ज़ाइद तिजारती तौर पर उगाए जाते हैं। इसके अलावा देसी ग़ैर-क़लमी अक़्साम की भी बड़ी तादाद मौजूद है। उत्तर प्रदेश आम की पैदावार में भारत का सर-ए-फ़ेहरिस्त सूबा है। आम की काश्त का रक़्बा और पैदावार दोनों में मुसलसल इज़ाफ़ा हो रहा है।

बरामदात के हवाले से हिन्दुस्तान ने हालिया बरसों में आलमी मंडी में अपनी मौजूदगी को मुस्तहकम किया है। सन 2022-23 में भारत ने 22,963.78 मीट्रिक टन आम बरामद किया, जिसकी मालियत 48.53 मिलियन अमरीकी डॉलर थी। अगले साल अप्रैल ता अगस्त 2023 के दौरान यह बढ़कर 27,330.02 मीट्रिक टन हो गया, जिसकी क़ीमत 47.98 मिलियन डॉलर रही। बुनियादी तौर पर अल्फ़ांसो, कैसर और लंगड़ा अक़्साम के आम मशरिक़े-वुस्ता, बरतानिया, अमरीका, जापान, ऑस्ट्रेलिया और न्यूज़ीलैंड को बरामद किए जाते हैं।

आम ने सदियों से शाइरों, अदीबों, फ़नकारों और कहानीकारों को मुतास्सिर किया है। हिन्दुस्तान के अज़ीम शाइर कालिदास ने फ़ितरत के बयान में आमों का ज़िक्र किया है। संस्कृत शाइरी में आम के फूलों को बहार और शबाब-ओ-मुहब्बत की अलामत माना गया है।

सूफ़ी शाइर, मूसीक़ार और दानिशवर अमीर ख़ुसरो (1253–1325) ने आम को हिन्दुस्तान का इस्तिआरा और हुस्न का निशान क़रार दिया। उन्होंने आम को “नग़्ज़ तरीन मेवए-हिन्द” कहा यानी हिन्दुस्तान का सबसे ख़ूबसूरत फल। उनकी एक मशहूर मुकरी मुलाहिज़ा हो:

मुँह से मुँह लगे रस पीवे, वा ख़ातिर में ख़र्चे दाम,
ऐ सखी साजन?
ना सखी! आम!
यानी: “मुँह से लगते ही रस देता है, और उसके लिए मैं दाम ख़र्चती हूँ, ऐ सखी, वह साजन है? नहीं सखी, वह आम है!”

उर्दू अदब में आम मुहब्बत, अपनाइयत और हुस्न-ए-ज़ौक़ की अलामत है। मशहूर शाइर मिर्ज़ा असदुल्लाह ख़ाँ ग़ालिब (1797–1869) आम के शैदाई थे। उन्होंने आम की तारीफ़ में 33 अशआर पर मुश्तमिल एक मसनवी लिखी  मसनवी दर सिफ़त-ए-अंबह। इस मसनवी से दो अशआर मुलाहिज़ा फ़रमाइए:

मुझ से पूछो तुम्हें ख़बर क्या है
आम के आगे नैशकर क्या है

(नैशकर: फ़ारसी में गन्ना)

और दौड़ाइए क़ियास कहाँ
जान-ए-शीरीं में वो मिठास कहाँ

ग़ालिब ने कहा था: “आम हों और बहुत सारे हों!” उन्होंने अपने दोस्त रज़ीउद्दीन ख़ाँ का, जो आम पसंद नहीं करते थे, मज़ाक़ भी उड़ाया। उनके ख़ुतूत में आम का बार-बार ज़िक्र मिलता है।

उर्दू के एक और मशहूर शाइर अकबर इलाहाबादी (1846–1921) भी आम के आशिक़ थे। उन्होंने अपने दोस्त मुंशी निसार हुसैन को एक नज़्म-नुमा ख़त लिखा जिसमें आम भेजने की फ़रमाइश की। यह “आम नामा” के नाम से मशहूर हुआ:

आम नामा

नामा न कोई यार का पैग़ाम भेजिए
इस फ़स्ल में जो भेजिए, बस आम भेजिए
ऐसा ज़रूर हो कि उन्हें रख के खा सकूँ
पुख़्ता अगरचे बीस, तो दस ख़ाम भेजिए
मालूम ही है आप को बन्दे का एड्रेस
सीधे इलाहाबाद मेरे नाम भेजिए
ऐसा न हो कि आप यह लिखें जवाब में
तामील होगी, पहले मगर दाम भेजिए

सआदत हसन मंटो (1912–1955) ने भी आम पर एक पुरअसर कहानी “आम” लिखी। अबुलफ़ज़्ल सिद्दीक़ी (1908–1987) ने अपनी कहानी “गुलाब ख़ास” में आम की एक नायाब सुर्ख़ क़िस्म को मरकज़ बनाया।

लखनऊ के एक मारूफ़ शाइर सुहैल काकोरवी ने “आम नामा” के उन्वान से आम पर सबसे तवील नज़्म लिखी है। हमारे अहद के तंज़-ओ-मिज़ाह के नामवर शाइर साग़र ख़यामी ने “आम का सेहरा” के उन्वान से एक निहायत दिलचस्प नज़्म रक़म की है जो आम के हर सीज़न में सोशल मीडिया पर छाई रहती है। इसी तरह लखनऊ की ही एक ख़ातून शाइरा हिना रिज़वी की आम पर नज़्म भी सोशल मीडिया पर बहुत मक़बूल हुई है।

हिन्दी, बंगाली, तमिल और दीगर इलाक़ाई अदब में आम को बचपन, देहाती ज़िन्दगी, ममता और मौसम-ए-बहार की ख़ुशी से जोड़ा गया है। लोक गीतों, लोरियों और कहावतों में आम यादों और मुहब्बत का निशान बन चुका है। भारतीय कपड़ा-कारीगरी और मुसव्विरी में आम की शक्लें नुमायाँ तौर पर दिखाई देती हैं। मुग़ल मुसव्विरी में आम की पैज़ी (निस्फ़ दाइरा) नुमा शक्ल बहुत मक़बूल रही है।

हिन्दुस्तान में आम की अक़्साम का जो तनव्वो है, वह बेमिसाल है  यहाँ हज़ारों क़िस्मों के आम मिलते हैं, हर एक का ज़ाइक़ा और ख़ुश्बू मुनफ़रिद।

मशहूर अक़्साम:

अल्फ़ांसो (हापुस) (महाराष्ट्र), कैसर (गुजरात), चौंसा, दसहरी, लंगड़ा, गुलाब जामुन, रटौल, दूधिया मालदा (उत्तर प्रदेश, बिहार), बंगन पल्ली (आंध्र प्रदेश)।
दीगर अक़्साम जैसे तोतापुरी, मालदा, मलिका, इमाम पसंद भी मक़ामी तौर पर मशहूर हैं। आम से बनने वाली अशिया जैसे आम पना, आम रस, आम लस्सी, कैरी की चटनी, सिरके की चटनी, आम पापड़,  सब भारतीय ज़ाइक़े और स़क़ाफ़त का हिस्सा हैं।

जैसे ही मौसम-ए-गर्मा की आमद होती है, हिन्दुस्तान के मुख़्तलिफ़ ख़ित्तों के लोग फलों के बादशाह आम का जश्न मनाना शुरू कर देते हैं। मौसम-ए-गर्मा यहाँ आम का मौसम होता है। आम की दावतों का मौसम होता है। दोस्तियों और मुहब्बतों के इज़हार का मौसम होता है।

बिला शुब्हा आम, हिन्दुस्तानी ज़ाइक़ों में नुमायाँ मक़ाम रखता है और फलों की दुनिया में अपनी अलग-अलग क़िस्मों की वजह से यह सिर्फ़ एक फल नहीं रह जाता बल्कि फलों की दुनिया में बदल जाता है। मुल्क और बैरून-ए-मुल्क जिस तरह से इसकी माँग होती है, वह यह बताती है कि आम सिर्फ़ हिन्दुस्तान ही में नहीं, दूसरे ममालिक में भी लोगों के ज़ाइक़े और ज़बान पर हुकूमत करता है।

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