
मिर्ज़ा असदुल्लाह ख़ान ग़ालिब न सिर्फ़ उर्दू ज़बान के एक अज़ीम शायर हैं, बल्कि उर्दू नस्र के एक बुनियाद-गुज़ार अदीब के तौर पर भी उनकी हैसियत इसी क़दर मुस्तहकम है। अगरचे ग़ालिब को अवामी तौर पर ज़्यादा तर उनकी शायरी के हवाले से जाना जाता है, लेकिन हक़ीक़त यह है कि उनकी नस्र भी उर्दू ज़बान-ओ-अदब की तरक़्क़ी में एक संग-ए-मील की हैसियत रखती है।
ग़ालिब का दौर (1797-1869) बर-ए-सग़ीर में ज़बान, मुआशरत और तहज़ीब के शदीद तग़य्युरात का दौर था। मुग़लिया सल्तनत ज़वाल-पज़ीर थी, अंग्रेज़ इक़्तेदार संभाल रहे थे, और ज़बान-ओ-अदब एक नए दौर में दाख़िल हो रहे थे। उर्दू नस्र उस वक़्त तक ज़्यादा तर रस्मी और अरबी-ओ-फ़ारसी के भारी भरकम अल्फ़ाज़ से ममलू थी। ख़त-ओ-किताबत में अदब का अंदाज़ ऐसा था कि आम आदमी के लिए समझना दुश्वार हो जाता था। इसी पस-ए-मंज़र में ग़ालिब की नस्र एक इंक़िलाबी तब्दीली के तौर पर उभरी।
मिर्ज़ा ग़ालिब की नस्र ज़्यादा तर ख़ुतूत पर मुश्तमिल है। उनके ख़ुतूत का मजमूआ “ऊद-ए-हिंदी” और “उर्दू-ए-मुअल्ला” के नाम से मशहूर है। यह ख़ुतूत न सिर्फ़ ज़ाती बातचीत का ज़रिया थे बल्कि उर्दू नस्र में सादगी, बे-तकल्लुफ़ी और बर्जस्तगी का पहला अमली मज़हर भी बने।
ग़ालिब ने ख़त को महज़ एक रस्मी और तहनियति वसीला समझने के बजाय एक ज़िंदा, मुतहर्रिक और रवाँ-दवाँ इज़हार का ज़रिया बनाया। उन्होंने ख़त को मुकालमाती शक्ल देते हुए उसे फ़ितरी अंदाज़ में लिखा, जैसे कोई दोस्त दूसरे दोस्त से रू-ब-रू गुफ़्तगू कर रहा हो।

ग़ालिब की नस्र का सबसे बड़ा कारनामा यह है कि उन्होंने उर्दू नस्र को बनावटी अंदाज़ से निजात दिलाई। उनसे पहले ख़ुतूत में मुबालिग़ा-आमेज़ अलक़ाबात, शे’री ज़बान और ग़ैर ज़रूरी तआरुफ़ का ग़लबा होता था। रंगीनी-ओ-क़ाफ़िया-पेमाई, नस्र की ख़ूबी समझी जाती थी। ग़ालिब ने इस रिवायत को तोड़ते हुए सलीस, सादा और दिलनशीं नस्र को फ़रोग़ दिया। उनके जुमले छोटे, बर्जस्ता और पुर-असर होते हैं। कहीं-कहीं मज़ाह का पहलू भी नुमायाँ होता है जो उनकी नस्र को दिलचस्प बना देता है। यह मज़ाह उनकी तबीयत का ख़ास्सा था जिसकी झलक हमें उनके ख़ुतूत में जा-बजा दिखाई देती है। ख़ुतूत-ए-ग़ालिब की सादा और बे-साख़्ता ज़बान ने उर्दू नस्र को एक नई राह दिखाई, जिसका असर बाद की नस्र में भी वाज़ेह तौर पर महसूस होता है।
ग़ालिब के ख़ुतूत सिर्फ़ शख़्सी ख़यालात का इज़हार नहीं थे बल्कि उनमें अदबी, फ़लसफ़ियाना, तहज़ीबी और सियासी मुशाहिदात भी शामिल थे। वह अपने ख़ुतूत में ज़िंदगी के तल्ख़-ओ-शीरीं पहलुओं, इंसानी रवय्यों, ज़माने की तब्दीलियों और अपने अदबी नज़रियात पर भी रौशनी डालते हैं। इस तरह उनकी नस्र महज़ एक शख़्स की बातचीत नहीं बल्कि एक अहद का दस्तावेज़ी बयान भी बन गई है।
ग़ालिब की नस्र का एक और क़ाबिल-ए-ज़िक्र पहलू उनका हिस-ए-मज़ाह और तंज़ है। उनके कई ख़ुतूत में चुभता हुआ तंज़ और नफ़ीस मज़ाह पाया जाता है जो उनके गहरे मुशाहिदे और ज़हानत की दलील है। यह तंज़ कभी हालात पर होता है, कभी रस्म-ओ-रिवाज पर, और कभी ख़ुद पर। मिसाल के तौर पर वह अपने मआशी हालात का ज़िक्र करते हुए लिखते हैं:
"काश मैं क़ब्र में होता और ख़त न लिखता।''
यह ख़ुद पर हँसी उड़ाने का ऐसा अंदाज़ है जो उर्दू नस्र को बे-साख़्तगी और इंसानियत के क़रीब ले आता है।
मिर्ज़ा ग़ालिब के बाद उर्दू नस्र में जो रवानी, सादगी और बे-तकल्लुफ़ी आई, वह उनके ख़ुतूत का ही नतीजा थी। सर सैयद अहमद ख़ान, मुहम्मद हुसैन आज़ाद, शिब्ली नोमानी, अबुल कलाम आज़ाद और बाद के कई नस्र-निगारों पर ग़ालिब के नस्री तर्ज़ का गहरा असर दिखाई देता है।
ग़ालिब के नस्री उस्लूब ने न सिर्फ़ उर्दू नस्र को नए साँचे में ढाला बल्कि ज़बान को अवाम के लिए क़ाबिल-ए-फ़हम और दिलकश बनाया। उनकी नस्र से उर्दू ज़बान में बयान की आज़ादी, जुमलों की रवानी और इज़हार की जुर्रत ने जन्म लिया।
उर्दू अदब में ग़ालिब का तआवुन सिर्फ़ उनकी शायरी तक महदूद नहीं। उनकी नस्र भी उतनी ही क़ीमती और इंक़िलाबी है। उनके ख़ुतूत उर्दू नस्र की पहली हक़ीक़ी, फ़ितरी और ज़िंदा शक्ल हैं जिन्होंने अदब को ज़िंदगी से जोड़ा। ग़ालिब की नस्र ने उर्दू ज़बान को न सिर्फ़ एक नया अंदाज़-ए-बयान दिया बल्कि उसे एक नए फ़िक्री, तहज़ीबी और फ़न्नी सफ़र पर गामज़न किया। यही वजह है कि आज भी ग़ालिब के ख़ुतूत उर्दू अदब के आला नमूने समझे जाते हैं, और उसके असरात उर्दू नस्र में आज तक महसूस किए जा सकते हैं।
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