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पिछले ब्लॉग में हमने जाना कि रुक्न क्या होते हैं और ये कितनी तरह के हैं। बह्र का शाब्दिक अर्थ है समुन्दर। अरूज़ में बह्र उस रिदम, उस मीटर को कहते हैं जिस पर कोई ग़ज़ल कही जाती है। बह्र एक साँचा है जिस में लफ़्ज़ों को ढाला जाता है। एक बह्र चुन लेने के बाद ग़ज़ल के हर मिसरे का उस बह्र में होना ज़रूरी है।
बह्र रुक्नों के संयोजन से बनती है। कुछ बह्रें एक ही रुक्न की तकरार से बनती हैं तो कुछ दो या दो से अधिक रुक्नों के मेल से। बह्र में अरकान की तादाद तय होने से उसमें एक ख़ास तरह की लय पैदा हो जाती है। ये लय ही ग़ज़ल को संगीत से जोड़ती है। उसे गाने लायक़ बनाती है। जैसे कि ये ग़ज़ल;
आपकी याद आती रही रात भर
चश्म-ए-नम मुस्कुराती रही रात भर
इसमें जो संगीत है वो रुक्न फ़ाइलुन की चार बार की तकरार से पैदा हो रहा है।
फ़ाइलुन - फ़ाइलुन - फ़ाइलुन - फ़ाइलुन
212 - 212 - 212 - 212
आप की - याद आ - ती रही - रात भर
फ़ाइलुन - फ़ाइलुन - फ़ाइलुन - फ़ाइलुन
212 - 212 - 212 - 212
चश्मे-नम - मुस्कुरा - ती रही - रात भर
उर्दू में मुख्य रूप से तीन तरह की बह्रें पाई जाती हैं।
जैसा कि नाम से ज़ाहिर होता है मुफ़्रद लफ़्ज़ फ़र्द से बना है। जिसका अर्थ है गिनती में एक, एक व्यक्ति। मुफ़्रद यानी अकेला, तन्हा, एकल को कहते हैं। मुफ़्रद बह्रों से मुराद वो बह्रें हैं जो एक ही सालिम रुक्न की तकरार से बनती हैं। इनकी संख्या 7 है।
एक मिसाल देखिए;
बह्र-ए-मुतक़ारिब मुसम्मन सालिम
मुहब्बत इनायत करम देखते हैं

इस बह्र के नाम में मुसम्मन है जिसका मतलब होता है 8, और सालिम से मुराद ये है कि बह्र में एक सालिम (पूर्ण) रुक्न का इस्तेमाल हुआ है। तो जैसा कि आप देख सकते हैं दोनों मिस्रों में 4-4 अरकान कुल 8 अरकान हैं और एक ही रुक्न फ़ऊलुन से ये बह्र बनी है। इसलिए इसका ये नाम पड़ा है- बह्र-ए-मुतक़ारिब मुसम्मन सालिम
आपने देखा कि एक ही रुक्न फ़ऊलुन की 4 बार की तकरार से ये बह्र बनी है। ऐसी तमाम बह्रें जो एक ही रुक्न की तकरार से बनती हैं उन्हें मुफ़्रद बह्र की केटेगरी में रखा जाता है।
वो बह्रें जो 2 अलग-अलग सालिम अरकान की तकरार से बनती हैं वो मुरक्कब बह्रों की केटेगरी में आती हैं। मुफ़्रद बह्र में एक ही सालिम रुक्न की तकरार से पूरी बह्र बनती है जबकि मुरक्कब बह्र दो अलग-अलग सालिम रुक्नों के मेल से बनती है।
इस मिसाल से समझिए;
बह्र-ए-मदीद मुसम्मन सालिम
ज़िन्दगी से क्या गिला ज़िन्दगी से क्या मिला

मुफ़्रद और मुरक्कब बह्रों के अलावा जितनी बह्रें हैं वो मुज़ाहिफ़ बह्रों की केटेगरी में आती हैं। इन बह्रों की पहचान बहुत ही आसानी से की जा सकती है। वो बह्र जिसमें कोई न कोई मुज़ाहिफ़ रुक्न पाया जाता हो उसे मुज़हिफ़ बह्र कहते हैं। एक मिसाल देखिए;
एक मुफ़्रद बह्र है, बह्र-ए-मुतक़ारिब मुसम्मन सालिम जिसकी तर्तीब कुछ ऐसी है;
फ़ऊलुन फ़ऊलुन फ़ऊलुन फ़ऊलुन
122 - 122 - 122 - 122
मुहब्बत इनायत करम देखते हैं
इसी बह्र के आख़िरी रुक्न फ़ऊलुन (122) को एक मुज़ाहिफ़ रुक्न फ़अल (12) से बदल देने पर जो नई तर्तीब बनती है उसे मुज़ाहिफ़ बह्र की केटेगरी में रखा जाता है।
बह्र-ए-मुतक़ारिब मुसम्मन महज़ूफ़
ख़ुदा हम को ऐसी ख़ुदाई न दे
कि अपने सिवा कुछ दिखाई न दे

आपने देखा कि इस बह्र में सालिम रुक्न फ़ऊलुन के साथ एक मुज़ाहिफ़ रुक्न फ़अल का भी इस्तेमाल हुआ है इसी बिना पर ये एक मुज़ाहिफ़ बह्र बन जाती है।
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