आइए, लिखते हैं अपनी पहली ग़ज़ल | Rekhta Learning

आइए, लिखते हैं अपनी पहली ग़ज़ल

Mahender Kumar Sani|13 Jan, 2026
आइए, लिखते हैं अपनी पहली ग़ज़ल

अब जब कि हम जान चुके हैं कि बह्र-ओ-वज़्न क्या होते हैं? मिसरा, रदीफ़, क़ाफ़िया, मतला, मक़्ता क्या हैं? एक शेर कैसे बनता है? ग़ज़ल कहने के लिए सब से पहले एक ज़मीन का चुनाव करना होता है। यह ज़मीन किसी उस्ताद शायर द्वारा पहले से कही गई ग़ज़ल के किसी मिसरे पर हो सकती है या शायर के ज़ेहन में ख़ुद से कोई मिसरा आया हो।

ग़ज़ल के संदर्भ में ज़मीन उस मिसरे को कहते हैं जिस पर ग़ज़ल कही जानी है। ज़मीन यह तय करती है कि ग़ज़ल किस बह्र में होगी, उसकी क्या रदीफ़ होगी और क्या क़ाफ़िया होगा। मिसाल के तौर पर ग़ालिब की एक मशहूर ग़ज़ल है;

दिले-नादां तुझे हुआ क्या है 
आख़िर इस दर्द की दवा क्या है  

मान लीजिए आपने ‘आख़िर इस दर्द की दवा क्या है’ को ज़मीन बनाकर एक ग़ज़ल कही है तो कहा जाएगा कि आपने ग़ालिब की ज़मीन पर ग़ज़ल कही है जिसकी बह्र है - 

फ़ाइलातुन मुफ़ाइलुन फ़ेलुन 
2122  -  1212   - 22 

और क़ाफ़िया है - हुआ, दवा, ख़ुदा यानी आ की मात्रा का और रदीफ़ है “क्या है”

ये ज़रूरी नहीं कि आप पहले से कही गई ग़ज़ल के मिसरे को ही ज़मीन बनाकर ग़ज़ल कहें। आप ख़ुद कोई मिसरा लेकर ग़ज़ल कह सकते हैं बस शर्त है वो मिसरा किसी बह्र में हो और उसमें क़ाफ़िया-रदीफ़ हो ताकि एक मुकम्मल ग़ज़ल कही जा सके। मिसाल के तौर पर आपको अचानक एक मिसरा सूझे, “आशिक़ी है ये कोई इबादत नहीं” तो आपको देखना होगा कि इस मिसरे कि बह्र क्या हो सकती है और इसमें क़ाफ़िया-रदीफ़ क्या होंगे। 
आपने मिसरे को तक़्तीअ करके देखा 

आशिक़ी है ये कोई इबादत नहीं जो कि फ़ाइलुन - फ़ाइलुन - फ़ाइलुन - फ़ाइलुन  की तर्तीब पर आता है। इबादत का क़ाफ़िया लिया जा सकता है जिस पर मुहब्बत, शिकायत, अदावत जैसे अल्फ़ाज़ को बतौर क़ाफ़िया बाँधा जा सकता है। और ‘नहीं’ इसकी रदीफ़ हो जाएगी। 

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अब आप इसी ज़मीन यानी तयशुदा बह्र और रदीफ़ क़ाफ़िया पर एक मतला और 4-5 शे’र कहिए।

कोई शिकवा नहीं है शिकायत नहीं 
अब किसी से भी मुझ को अदावत नहीं

कोई बंधन नहीं है किसी रस्म का 
आशिक़ी है ये कोई इबादत नहीं

उसको सब कुछ हो लेकिन अभागा है वो
जिसके जीवन में यारो मुहब्बत नहीं

मैं तुम्हें कोई नुक़सान पहुँचाऊंगा 
दोस्तो! दुश्मनी मेरी फ़ित्रत नहीं

तो आपने देखा किस तरह से हम एक ज़मीन का इन्तिख़ाब करके उस पर ग़ज़ल कहते हैं।

आप भी कोई मिसरा लेकर उस पर ग़ज़ल कहिए और हमें भेजिए। 

 

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