
जब भी बर्र-ए-सग़ीर की लिसानी व सक़ाफ़ती तारीख़ पर नज़र डाली जाए, तो सूफ़ियाए किराम की ख़िदमात को नज़रअंदाज़ करना मुमकिन नहीं रहता। ज़बान महज़ इज़हार का वसीला नहीं, बल्कि तहज़ीब, रूहानियत और इंसानी तजुर्बात का आईना भी है। उर्दू ज़बान की तश्कील व तरवीज में अगर किसी तबक़े ने ख़ालिस इख़लास, मोहब्बत और हिकमत के साथ काम किया तो वह सूफ़ियाए किराम थे। इन बुज़ुर्गों ने न सिर्फ़ रूहानी इंक़लाब बरपा किया बल्कि अवामुन्नास के साथ ज़बान की सतह पर एक ऐसा रिश्ता क़ायम किया जिसने उर्दू को एक अवामी, मोहब्बत भरी और अपनाइयत से भरपूर ज़बान बना दिया।
सूफ़िया की ख़ानक़ाहें रूहानी तरबियत के साथ-साथ इल्मी व तहज़ीबी मराकिज़ भी हुआ करती थीं। यहाँ हिंदी, फ़ारसी, पंजाबी, दकनी, ब्रज भाषा, सिंधी, सराइकी और दीगर इलाक़ाई ज़बानों के बोलने वाले लोग जौक़ दर जौक़ आते, और सादा, दिलनशीं ज़बान में सूफ़ी बुज़ुर्गों की बातें सुनते। यही सादगी और दिल से दिल तक की रसाई उर्दू की अव्वलीन पहचान बन गई।
हज़रत ख़्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती, हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया, हज़रत बाबा फ़रीद गंज शकर, हज़रत शाह लतीफ़ भिटाई, हज़रत शाह हुसैन, और हज़रत सख़ी सरवर जैसे सूफ़िया ने अवाम से मुक़ामी ज़बानों में ख़िताब किया, उनकी ज़बान में शेर कहे, और पैग़ाम-ए-हक़ को दिलों तक पहुँचाया। उनकी बातें अवामी ज़बान में थीं मगर मफ़हूम में आला दर्जे की हिकमत व मआरिफ़त लिए हुए।
सूफ़िया ने फ़ारसी, जो उस वक़्त इल्मी और दरबारी ज़बान थी, की बजाय अवामी ज़बान को तरजीह दी। इसकी वजह यह थी कि वह चाहते थे कि उनका पैग़ाम हर ख़ास व आम तक पहुँचे। उन्होंने सादा और आम-फ़हम ज़बान में शायरी की, वअज़ कहे और अपने मुरिदीन को तालीम दी। यही सादगी और आम-फ़हमी ही थी जिसने उर्दू को अवाम में मक़बूल बनाया।

हज़रत ख़्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती, बाबा फ़रीदुद्दीन गंज शकर, हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया, और हज़रत अमीर ख़ुसरो जैसे अज़ीम सूफ़िया ने अपनी शायरी और नस्री तहरीरों में मुक़ामी अल्फ़ाज़ और मुहावरात का इस्तेमाल किया, जिससे उर्दू का दामन वसीअ होता चला गया। इसी तरह ख़्वाजा बंदा नवाज़ गेसू दराज़ ने भी उर्दू ज़बान के फ़रोग़ में नुमायाँ किरदार अदा किया। मिराजुल आशिक़ीन, तिलावतुल वुजूद, शिकार नामा और हिदायत नामा उनकी मशहूर तसानीफ़ हैं। इन बुज़ुर्गों के अलावा शेख़ शरफ़ुद्दीन मनेरी, सदरुद्दीन, सैयद मुहम्मद अकबर हुसैनी, शाह मीरांजी शम्सुल उश्शाक, हज़रत क़ुतुब आलम, हज़रत शाह आलम, हज़रत सैयद मुहम्मद जौनपुरी, शेख़ बहाउद्दीन बाजन, शेख़ अब्दुल क़ुद्दूस गंगोही के यहाँ नसर व नज़्म के ऐसे शाहकार मिलते हैं जिन्हें क़दीम रेख़्ता या दकनी के नाम से जाना जाता है।
सूफ़ियाए किराम ने उर्दू शायरी को एक नई जहत दी। उनकी शायरी में तसव्वुफ़ के रुमूज़ व नुक़ात, मआरिफ़त-ए-इलाही, इश्क़-ए-हक़ीक़ी और इंसानी हमदर्दी के मज़ामीन मिलते हैं। उन्होंने दोहे, गीत, क़व्वालियाँ और मसनवियाँ लिखीं जिनमें उर्दू के अल्फ़ाज़ और तश्बीहात को इस ख़ूबसूरती से इस्तेमाल किया गया कि वह आज भी ज़बान का हिस्सा हैं। बाबा फ़रीदुद्दीन गंज शकर की पंजाबी और उर्दू शायरी, और हज़रत अमीर ख़ुसरो की हिंदी आमेज़ उर्दू शायरी इसकी बेहतरीन मिसालें हैं। अमीर ख़ुसरो को तो उर्दू के अव्वलीन शुअरा में शुमार किया जाता है जिन्होंने “हिंदवी” के नाम से इस ज़बान में कसीर शायरी की। उनकी पहेलियाँ, कह-मुकरनियाँ और दो सुख़ने आज भी उर्दू के अदबी सरमाए का हिस्सा हैं।
छाप तिलक सब छीनी रे मोसे नैना मिलाई के
बात अधम कह दीनी रे मोसे नैना मिलाई के
ख़ुसरो निज़ाम के बल-बल जाइए
मोहे सुहागन कीनी रे मोसे नैना मिलाई के
सूफ़ियाए किराम की ख़ानक़ाहें सिर्फ़ इबादतगाहें नहीं थीं बल्कि वह इल्मी और अदबी मराकिज़ भी थीं। यहाँ न सिर्फ़ मज़हबी तालीमात दी जाती थीं बल्कि उर्दू ज़बान-ओ-अदब की तरवीज भी की जाती थी। सूफ़िया के मुरिदीन और अकीदतमंद इन ख़ानक़ाहों में जमा होते, सूफ़िया के वअज़ सुनते और उनकी बातों को नक़्ल करते। इस तरह उर्दू के अल्फ़ाज़ और मुहावरात एक से दूसरे तक पहुँचते गए। इन ख़ानक़ाहों में उर्दू में लिखी गई किताबें, रिसाले और मलफ़ूज़ात तैयार किए गए जो आज उर्दू के क़दीम अदब का हिस्सा हैं। सूफ़िया के मलफ़ूज़ात ने भी उर्दू नस्र के इर्तिक़ा में अहम किरदार अदा किया जो उनके अक़वाल और गुफ़्तार पर मुश्तमिल होते थे । ये मलफ़ूज़ात सादा और रवाँ उर्दू में लिखे जाते थे, जो उस वक़्त की आम बोलचाल की ज़बान की अक्कासी करते हैं।
सूफ़िया ने उर्दू को सिर्फ़ एक लिसानी ढांचा नहीं दिया बल्कि उसे हिंद-इस्लामी तहज़ीब की अलामत बना दिया। उनकी तालीमात ने मुख़्तलिफ़ मज़ाहिब और तबक़ात के लोगों को क़रीब लाने का काम किया और एक मुश्तरका सक़ाफ़ती विर्से की बुनियाद रखी। उर्दू ने इस मुश्तरका तहज़ीब की तरजुमानी की, जहाँ फ़ारसी, अरबी, हिंदी और मुक़ामी बोलियों के अल्फ़ाज़ बाहम घुल मिल गए और एक नई लिसानी पहचान को जन्म दिया। सूफ़िया की वजह से उर्दू में अरबी और फ़ारसी के बेशुमार अल्फ़ाज़ शामिल हुए, जो उर्दू के ज़खीरा-ए-अल्फ़ाज़ को तक़वियत बख़्शते चले गए।
बिला-शुब्हा, उर्दू के फ़रोग़ में सूफ़ियाए किराम का किरदार एक संग-ए-मील की हैसियत रखता है। उन्होंने इस ज़बान को अवामी सतह पर पज़ीराई बख़्शी, उसे अदबी रंग दिया और उसे एक ऐसी तहज़ीबी ज़बान बना दिया जो आज भी बर्र-ए-सग़ीर की सक़ाफ़त और पहचान का हिस्सा है। उनकी कोशिशों के बग़ैर उर्दू शायद कभी भी उस उरूज तक न पहुँच पाती जो आज उसे हासिल है। सूफ़िया ने उर्दू को महज़ एक ज़बान नहीं बल्कि एक पैग़ाम, एक तहज़ीब और एक रोशन ख़याल सोच की अलामत बनाया। उनका यह फ़ैज़ आज भी उर्दू बोलने और समझने वालों के लिए मशअल-ए-राह है।
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